जिस्म तो तेरा सिर्फ निगाहबां है
सरहदों में बंट कर जी रहा इन्सां
खुली ज़मीन और खुला आसमां है
नवाजिश है निस्बतें निभाते चलो
गर नुक्ताचीं भी कोई मेहरबां है
नायाब है कैद है इसलिए ही
बर्ग ए गुल में ज्यूँ खुशबू निहां है
तलाश ए सफ़र की इन्तहा कज़ा तक
करीम बनाया कैसा काबिज़ ज़हां है

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